मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

जोगेंद्र मावी, ब्यूरो
हरिद्वार। न​गर निगम हरिद्वार के तत्कालीन नगर आयुक्त वरूण चौधरी को धन की चाह ले डूबी। मात्र 10 करोड़ की भूमि को 56 करोड़ में खरीदकर खुद तो गए, कई अधिकारियों को भी ले डूबे। हालांकि इस मामले में फाइल तैयार करने वाला पीसीएस के साथ सौदा कराने वाला लेखपाल बच गया, क्योंकि तत्कालीन डीएम प्रशासक नगर निगम ने फाइल उसके मुंह पर फेंककर मार दी थी। मामले में बड़ा एक्शन हुआ है। 10 लोगों पर मुकदमा दर्ज होने के साथ पूर्व नगर आयुक्त वरूण चौधरी की बर्खास्तगी और तत्कालीन डीएम पर मेजर पनिशमेंट की संस्तुति की गई है। मामले का खुलासा करने पर (IAS) वरूण ने पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी थी।


भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हरिद्वार नगर निगम भूमि खरीद प्रकरण में बड़ी और कड़ी कार्रवाई की है। प्रकरण में तत्कालीन नगर आयुक्त हरिद्वार नगर निगम वरुण चौधरी को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर की संस्तुति की गई है। वहीं, तत्कालीन जिलाधिकारी हरिद्वार कर्मेंद्र सिंह को अपने पदीय दायित्वों एवं कर्तव्यों के समुचित निर्वहन में गंभीर लापरवाही का दोषी मानते हुए उनके विरुद्ध दीर्घ शास्ति (मेजर पनिशमेंट) अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया है। दोनों अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को संस्तुति भेजी जा रही है। इसके अलावा, उस समय कार्यरत एसडीएम अजयवीर सिंह के विरुद्ध परनिंदा प्रविष्टि दर्ज करने तथा उनकी तीन वेतनवृद्धियां रोकने के निर्देश भी दिए गए हैं।

तत्कालीन नगर आयुक्त वरूण चौधरी।

मुकदमें भी होंगे दर्ज
वहीं, मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य सतर्कता समिति की संस्तुति पर मामले में संलिप्त अधिकारियों, कर्मचारियों तथा भूमि विक्रेताओं के विरुद्ध अभियोग दर्ज किए जाने का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा अनुमोदन किया गया है। जांच में दोषी पाए गए व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जाएगी।

तत्कालीन जिलाधिकारी एवं प्रशासक कामेंद्र सिंह।

अभियोग दर्ज किए जाने वाले व्यक्तियों में तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी, तत्कालीन सहायक नगर आयुक्त रविन्द्र कुमार दयाल, तत्कालीन कर अधीक्षक लक्ष्मीकान्त भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियन्ता एवं प्रभारी अधिशासी अभियंता आनन्द सिंह मिश्राण, तत्कालीन सम्पत्ति लिपिक वेदपाल तथा तत्कालीन मानचित्रकार दिनेश कांडपाल शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त भूमि विक्रेता एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों में सुमन देवी, जितेन्द्र कुमार, अभिषेक यादव तथा सुजीत कुमार सिंह के विरुद्ध भी अभियोग दर्ज किया जाएगा। प्रमुख विक्रेता धनपाल सिंह यादव की मृत्यु हो चुकी है।

ये है पूरा मामला
नगर निगम हरिद्वार की ओर से सराय में भूमि खरीदी गई। भूमि खरीद फरोख्त में बड़ा घोटाला हुआ। भूमि खरीदने से पहले भूमि लैंडयूज बदला गया। 16 अक्टूबर 2024 के अन्तर्गत खाता सं0 75 खसरा सं० 121 क्षेत्रफल 0.5230 हैक्टेयर भूमि स्थित सराय परगना ज्वालापुर तहसील व जिला हरिद्वार को अपने व्यवसायिक प्रयोजन हेतु ज०वि०अधिनियम की धारा 143 के अन्तर्गत अकृषिक घोषित किया जाता है। इसी प्रकार अन्य खसरा नंबर 99/1, 122/4 को अकृषि किया गया। इसमें खसरा संख्या 96/1 को अकृषि नहीं किया गया, लेकिन उसे भी 6510 रुपये मीटर के हिसाब से खरीदा गया। उसमें 0.3794 हैक्टेअर भूमि के तौर पर खरीदा गया।
कुल भूमि 23,004 वर्ग मीटर खरीदी गई, जोकि प्रति बीघा 683.66 मीटर के हिसाब से 33.64 बीघा बैठती है। यह भूमि 53 करोड़ 06 लाख, 96 हजार 565 रुपये की नगद में खरीदी और 5 प्रतिशत के हिसाब से करीब 2 करोड़ 70 लाख रुपये का स्टाम्प और एक लाख रुपये की चार रसीद कटवाई गई। 4 रजिस्ट्री की लिखाई 12 हजार रुपये होती है। 55 करोड़ 77 लाख 96 हजार 655 रुपये की होती है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

जांच कर हुई कार्रवाई
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर पूरे प्रकरण में जांच वरिष्ठ आईएएस रणवीर सिंह चौहान के निर्देशन में हुई। जांच में पाया गया है कि उक्त भूमि को क्रय किये जाने हेतु गठित समिति के सदस्य के रूप में रवीन्द्र कुमार दयाल, अधिशासी अधिकारी श्रेणी-2 (प्रभारी सहायक नगर आयुक्त), नगर निगम, हरिद्वार, आनन्द सिंह मिश्रवाण, सहायक अभियन्ता (प्रभारी अधिशासी अभियन्ता), नगर निगम, हरिद्वार, लक्ष्मीकांत भट्ट, कर एवं राजस्व अधीक्षक, नगर निगम, हरिद्वार और दिनेश चन्द्र काण्डपाल, अवर अभियन्ता, नगर निगम, हरिद्वार द्वारा अपने दायित्वों का सम्यक् रूप से निर्वहन नहीं किया गया है। इस पर इन सभी अधिकारियों को निलम्बित कर दिया गया। इस प्रकरण में सेवा विस्तार पर कार्यरत सेवानिवृत्त सम्पत्ति लिपिक वेदपाल की संलिप्तता पायी गई। वेदपाल का सेवा विस्तार समाप्त करते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। मामले में निगम की वरिष्ठ वित्त अधिकारी निकिता बिष्ट का स्पष्टीकरण तलब किया गया था।


अकृषि यानि 143 का नियम
किसान की भूमि को कृषि से अकृषि भूमि किए जाने पर नियम है ​कि किसान केवल अपने उपयोग में उक्त भूमि को ला सकता है, लेकिन इस नियम का भी पालन नहीं किया गया।
07 दिन में 143 कैसे हो गई, जबकि एक आमजन को 143 कराने में 6 महीने का समय लग जाता है। दाखिल खारिज कराने में पसीने छूट जाते है। प्रमाण पत्र बनवाने में एक महीने से अधिक का समय लग जाता है। जब पत्रकारों ने खबर चलाई तो उनकी आवाज दबाने के लिए उन्हें नोटिस जारी कर और पत्रकार वार्ता कर उनपर एफआईआर दर्ज कराने की धमकी तक दी।

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