जोगेंद्र मावी, ब्यूरो
हरिद्वार। श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में स्थापना दिवस अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में मुख्यातिथि के रूप पतञ्जलि विश्वविद्यालय के कुलपति पूज्याचार्य बालकृष्ण, विशिष्टातिथि के रूप में उत्तराखण्ड सरकार के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक के साथ प्रबन्धसमिति के अध्यक्ष प्रो. यशवीर सिंह, सारस्वतातिथि प्रो. रमाकान्त पान्डेय, कुलपति, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, मुख्य वक्ता के रूप में महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. भोला झा तथा प्रो. भगवानसहाय शर्मा, धर्मशास्त्राचार्य, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर उपस्थित रहें। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वज्जनों का स्वागत एवम् अभिनन्दन महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. रवीन्द्र कुमार ने किया। स्थापना दिवस के अवसर पर महाविद्यालय में निर्मित नवीन कक्षों का लोकार्पण पूज्याचार्य बालकृष्ण एवं कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने किया।


मुख्यातिथि के रूप में समुपस्थित पूज्याचार्य बालकृष्ण ने अपने उद्बोधन में कहा कि संस्कृत का अध्ययन किया हुआ छात्र कभी जीवन में निराश नहीं होता है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण का दायित्व संस्कृत के विद्यार्थियों का है। आज महाविद्यालय की स्थापना के अवसर पर हमें सङ्कल्प लेना है कि हम निरन्तर संस्कृत के शास्त्रों की रक्षा के लिए कार्य करेंगे। हमें अपनी वेशभूषा और शिखा पर गर्व होना चाहिए। संस्कृत को पढा हुआ विद्यार्थी किसी भी परिस्थिति में रहकर अनेक विपदाओं को सहते हुए कार्य करने की क्षमता रखता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस उद्देश्य को लेकर महाविद्यालय की स्थापना की गयी थी; उस उद्देश्य की पूर्त्ति के लिये महाविद्यालय निरन्तर गतिशील है। यह महाविद्यालय शास्त्रों के परम्परागत अध्ययन हेतु सर्वोत्कृष्ट स्थान है। इस महाविद्यालय ने सदैव छात्रहितों को ध्यान में रखते हुए कार्य किया है। यहां के छात्र अनेक उच्च पदों पर कार्यरत रहें हैं। योग एवम् आयुर्वेद का आचार्य होने के नाते इस महाविद्यालय की शैक्षणिक यात्रा में सदैव सहयोगी रहूंगा।


विशिष्टातिथि के रूप में समुपस्थित मदन कौशिक ने कहा कि यह महाविद्यालय निरन्तर उत्तराखण्ड राज्य का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश को गौरव है। यहाँ के छात्रों ने अपने कौशल से सदैव राष्ट्र का गौरव बढाया है।
मुख्यवक्ता के रूप में उपस्थित पूर्व प्राचार्य डॉ. भोला झा ने महाविद्यालय की स्थापना से आज तक के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पूज्यपाद स्वामी गुरुचरणदास जी महाराज ने 13 अप्रैल सन् 1965 को महाविद्यालय की स्थापना की थी। सन् 1978 में महाविद्यालय केन्द्र सरकार के शिक्षा मन्त्रालय की आदर्श योजना में स्वीकृत हुआ। धर्मशास्त्राचार्य प्रो. भगवानसहाय शर्मा मुख्यवक्ता के रूप में उपस्थित रहें। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि महाविद्यालय के इतिहास का लेखन किया जाना चाहिए। महाविद्यालय के छात्र सङ्कल्प लें कि जिस उद्देश्य से महाविद्यालय की स्थापना की गयी थी, वह उद्देश्य पूर्ण हो।
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. यशवीर सिंह ने बताया की आज महाविद्यालय को वेद एवं धर्मशास्त्र विभाग की मान्यता सरकार द्वारा प्रदान की गयी है; जो कि महाविद्यालय परिवार के लिये अत्यन्त गौरव का विषय है।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण ने महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकों को सम्मानपत्र प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकवृन्द, छात्र, कर्मचारी एवं नगर गणमान्य लोग उपस्थित रहें।

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