जोगेंद्र मावी, ब्यूरो
हरिद्वार। लक्सर रोड पर जगजीतपुर से लेकर लक्सर कस्बे तक हाईवे अवैध होर्डिंग से अटा हुआ है। अवैध होर्डिंग हाईवे के किनारे पर हर दस मीटर पर लगा हुआ है। होर्डिंग के साथ—साथ बिजली के पोल और सड़कों के किनारे के मकान तक नहीं बख्शे हैं। इन्हें हटाने के लिए विभागीय अधिकारी केवल नोटिस प्रक्रिया कहकर अतिश्री कर ले रहे हैं।
कनखल से लेकर लक्सर तक राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवैध होर्डिंग्स का ऐसा जाल फैला है, मानो पूरे क्षेत्र को होर्डिंग माफिया ने अपने कब्ज़े में ले लिया हो। सड़क किनारे और यहां तक कि मुख्य मार्गों के बेहद करीब लगे इन अवैध ढांचों ने न सिर्फ यात्रियों की सुरक्षा पर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि विभागीय अधिकारी कार्रवाई के नाम पर केवल “नोटिस खेल” में उलझे दिखाई देते हैं। अवैध होर्डिंग्स पर नोटिस जारी करना तो आसान है, लेकिन इन्हें हटाने की ठोस कार्रवाई कभी नहीं होती। इस काले कारोबार में कई अधिकारियों की मिलीभगत से कई लोग गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि कार्रवाई नोटिस से आगे बढ़ ही नहीं पाती।


दुर्घटनाओं का बढ़ता खतरा
सड़क किनारे लगे ये अवैध होर्डिंग्स हर दिन यात्रियों की जान को जोखिम में डाल रहे हैं। कई जगह तो ये होर्डिंग्स सड़कों से इतनी नज़दीक हैं कि जरा सी लापरवाही किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे सकती है। क्षेत्र में आए दिन दुर्घटनाओं की बढ़ती घटनाएं इस खतरे की पुष्टि करती हैं।
अभियंता के दावे और हकीकत
कुछ समय पहले विभाग के अधिशासी अभियंता सुरेश तोमर ने धड़ाधड़ नोटिस जारी कर सख्त कार्रवाई का दावा किया था। लेकिन उनका यह दावा केवल कागजों तक ही सीमित रहा। नोटिसों की बाढ़ आई, मगर नतीजा वही शून्य रहा। इससे विभागीय कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।
इन अवैध होर्डिंग से जहां एक ओर बड़े पैमाने पर राजस्व की हानि हो रही है, वहीं दूसरी ओर सड़क दुर्घटनाओं का खतरा आम जनजीवन को हर पल चुनौती दे रहा है।
चर्चा का बाज़ार गर्म है कि अवैध होर्डिंग माफियाओं और विभागीय अधिकारियों के बीच गहरे संबंध हैं। यही कारण है कि वर्षों से यह गोरखधंधा फल-फूल रहा है और राजस्व की लूट के साथ-साथ आम जनता की जान दांव पर लगी हुई है। साफ है कि सिंहद्वार से लक्सर तक फैले इस अवैध होर्डिंग माफियागिरी का मकड़जाल न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि विभागीय उदासीनता और राजनीतिक दबाव का जीता-जागता उदाहरण भी।

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